धर्मशास्त्रों में पूजा को हजार गुना अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिये एक उपाय बतलाया गया है, वह उपाय है, मानस पूजा। मानस पूजा का प्रचार कम होने से बहुत लोग इस पूजा पद्धति से अपरिचित हैं, शास्त्रों के अनुसार मानस पूजा अवश्य अपनानी चाहिए। भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं। संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर की पूजा की जा सके, इसलिये पुराणों में मानस पूजा का विशेष महत्व वर्णित है। भगवान की पूजा करते समय यदि सच्चे मन से मनःकल्पित एक पुष्प भी भगवान को अर्पण किया जाए तो करोड़ों बाहरी फूल चढ़ाने के बराबर होता है। इसी प्रकार मानस चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य भी भगवान को करोड़ गुना अधिक संतोष देते हैं।
मानस पूजा में भक्त अपने आराध्य देव के लिए श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पूजन सामग्री को अर्पण करने की कल्पना करता है, इस कार्य हेतु भक्त का मन इन पूजन वस्तुओं को एकत्र करने के लिए न केवल अनन्त ब्रह्माण्ड, बल्कि इसकी पहुंच से परे गोलोक, साकेतलोक, सदाशिवलोक तक पहुंच जाता है, यानी अनंत ब्रह्माण्ड में इन्द्रलोक से ब्रह्मलोक, कहीं से भी मानस पूजा में दिव्य वस्तुओं को एकत्र कर भगवान को अर्पण किया जाता है। इस प्रकार भक्त अपने आराध्य देव को दिव्य आसन देता है, वस्त्र और आभूषण पहनाता है, चन्दन लगाता है, मालाएं पहनाता है, धूप-दीप दिखलाकर नैवेद्य अर्पित करता है।
मानस पूजा विधि- वस्तुतः भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं। संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर की पूजा की जा सके, इसलिये पुराणों में मानस पूजा का विशेष महत्व माना गया है। मानस पूजा की संक्षिप्त विधि पुराणों से संकलित कर नीचे वर्णित है-
ओम लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि।
प्रभु, मैं पृथ्वी रूप गन्ध, चन्दन आपको अर्पित करता हूं।
ओम हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि।
प्रभु, मैं आकाश रूप पुष्प आपको अर्पित करता हूं।
ओम यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि।
प्रभु, मैं वायुदेव के रूप में धूप आपको प्रदान करता हूं।
ओम रं वह्नयात्मकं दीपं दर्शयामि।
प्रभु, मैं अग्निदेवके रूप में दीपक आपको प्रदान करता हूं।
ओम वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि।
प्रभु, मैं अमृतके समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूं।
ओम सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि।
प्रभु, मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूं।
ऊपर वर्णित मंत्रों से शुद्ध भावना पूर्वक मानस पूजा कर श्रेष्ठ फल प्राप्त किया जा सकता है।
